Radio Sciences and Applications

रेडियो विज्ञान मेँ दक्षता

राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला का रेडियो एवं विज्ञान विभाग भारत का एकमात्र विभाग है जो कि मूलभूत वैज्ञानिक शोध के अतिरिक्त पृथ्वी के वायुमंडल के क्षोभमंडल एवं आयनमंडल माध्यम के अभिलक्षणो का चित्रांकन रेडियो तरंग प्रसारण के संदर्भ मे करता है। जिनका अनुप्रयोग विशेष रूप से संचार प्रणाली ,कूटनीतिक, नौसंचालन इत्यादि मे होता है। विगत वर्षों मे इस विभाग ने विभिन्न प्रकार के संघटनों जैसे कि सेना के तीनों कमान , विदेश संचार निगम लिमिटेड , ऑल इंडिया रेडियो के शोध विभाग , सी- डॉट , निजी एफ एम संचालकों, विशेष सुरक्षा समूह इत्यादिको परामर्श प्रदान किया है। सचल एवं स्थिर संचार प्रणाली के क्षेत्र मे विभिन्न संघटनों को सलहकारी संस्था के रूप मे सेवा प्रदान करता रहा है। विभाग उन संस्थाओं को जो कि संचालन के लिए पूरी तरह से रेडियो संचार प्रणाली पर निर्भर है अपने क्षेत्रीय चेतावनी केन्द्रो द्वारा अंतरिक्षीय मौसम की जानकारी एवं सौर्य गतिविधियों कि भविष्यवाणी प्रदान करता रहा है। इस विभाग द्वारा किए गए वैज्ञानिक शोध भारतीय क्षेत्रों की वर्तमान प्रणाली के प्रदर्शन मूल्यांकन में सुधार एवं भविष्य की संचार प्रणालियों की रूपरेखा तैयार करने मे सहायक है।

रेडियो चैनल का मापन एवं सचल एवं स्थिर संचार प्रणाली के लिए मोडलिंग

पिछले कुछ वर्षों मे हमारा देश GSM एवं CDMA तक्नीकियों प्रवेश करने के बाद से बेतार संचार प्रणाली के क्षेत्र मे असीम विकास का गवाह रहा है, मुख्यतः चल संचार के क्षेत्र मे । विभिन्न शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि किसी भी देश की आर्थिक स्थिति मुख्य रूप से वहाँ के दूरसंचार घनत्व पर निर्भर करती है । प्रसारण चैनल मॉडलिंग शोध का एक सक्रिय क्षेत्र है एवं चल एवं स्थिर संचार प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक है। यह सेवा के शुरू होने के उपरांत अचानक से आने वाली बाधाओं से बचाता है।
स्थिर एवं चल संचार प्रणाली के लिए रेडियो चैनल मापन एवं माडलिंग

  1. GSM बैंड मे ९००/१८००/ २००० MHZ के नये डाटा सेट विभिन्न उपभोक्ता संगठनो को उपलब्ध कराये गये।
  2. बहु मार्ग ह्वास एवं जलवाष्प के प्रभाव का २,७,८ एवं १३ GHz पर line of sight links पर अध्ययन किया गया एवं सुधारात्मक आंकलन का अन्वेषन किया गया।
  3. अतिसूक्ष्म तरंगो पर जलवाष्प एवं बादल के प्रभाव का अध्ययन किया गया।
  4. कोशिकीय वाह्य संचार दृश्य योजना का प्रयोग कर के शहरी , उपशहरी, ग्रामीण, सुरंगित एवं, वानस्पतिक क्षेत्रों मे एकत्रित किए गए विभिन्न सांख्यिकीय एवं अनुभवजन्य मॉडल जाँचे गए।
  5. शहरी , उपशहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के ९०० & १८०० MHZ मे देखे गए नतीजों का वर्णन करने के लिए सांख्यिकीय विद्युत्चुंबकीय कोड जैसे कि AWAS का प्रयोग किया गया।
  6. यह भी वर्णित किया गया है कि बेस स्टेशन्स के पास के क्षेत्रों मे सिग्नल का गंभीर ह्वास था एवं दूरस्थित क्षेत्रों मे सिग्नल स्थिर थे। अन्तः स्थित क्षेत्रों मे घातांक ३ पाया गया जिसको कि विद्युत्चुंबकीय सिद्धान्त का प्रयोग करके मॉडलिंग की गयी।


दिल्ली क्षेत्र के शहरी एवं उपशहरी क्षेत्रों मे स्थित १८०० Mhz के बेस स्टेशन्स मे देखे गए नतीजों को वर्णित करने के लिए विद्युत्चुंबकीय कोड जैसे कि AWAS का प्रयोग किया गया।

चित्र १। विश्वविद्यालय क्षेत्र के बेस स्टेशन्स के ९०० MHz के विभिन्न के पथ ह्रास के निरीक्षित नतीजों का तुलनात्मक वर्णन

चित्र २। बेस स्टेशन्स के १८०० MHz के विभिन्न मॉडल्स के पथ ह्रास के निरीक्षित नतीजों का तुलनात्मक वर्णन

चित्र ३। ९०० MHz पर UA के बेस स्टेशन पर पथ ह्रास प्रतिपादक (exponent) मे विभिन्नता

आयनमंडलीय अध्ययन ।

आयनमंडल मे बहुत से जटिल अनुप्रयोग संचरण के समय पर किसी भी रेडियो संकेतक के रास्ते मे कुल electron मात्रा की विशुद्ध जानकारी पर अधारित होते हैं। आगे आने वाले समय मे यह जानकारी वायुयान अवतरण संबंधी प्रचालन या missile मार्गदर्शन जैसे संप्रयोगों मे संगणन के लिए आवश्यक होगी। इसके लिए शुरुआत मे अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ आयनमंडल प्रतिरूप (international reference ionosphere model) स्थानीय मापन के लिए व्युत्पन्न मोडेल मे क्षेत्रीय संशोधन के साथ प्रयोग किए गए । हाल ही मे ध्रुवीय आयनमंडल के अध्ययन के लिए Antartica मे Ionosonde स्थापित किया गया है। इन आंकड़ो का विश्लेषण निम्न अक्षांश भारतीय क्षेत्र एवं उच्च अक्षांश आयनमंडलीय ध्रुवीय क्षेत्रों के परस्पर संबंध के बारे मे पूर्णतया जानकारी प्रदान कर सकता है जो की भौगोलिक आयनमंडलीय modeling के अध्ययन मे सहयोग करेगा। इनके साथ-साथ राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला मे वर्तमान मे स्थापित Ionosonde एवं देश का GPS network पहले से ही उपस्थित है जो कि इस दिशा मे महत्वपूर्ण रूप से सहयोग करेगा। यह अत्यधिक आवश्यक है कि इस तंत्र को Ionosonde एवं टोमोग्राफिक रिसीवर sites की संख्या बढ़ाकर और अधिक विस्तृत किया जाए जिससे आने वाले समय मे आयनमंडलीय सुधार एवं modeling अध्ययन।

राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला मे Digital Ionosonde प्रणालियों ( दिल्ली, भोपाल, अंटार्टिक) द्विआवृत्ति ( Dual Frequency) GPS संग्राहक ( दिल्ली, त्रिवेन्द्रम, अंटार्टिक) , अवकृष्ट आवृत्ति (VLF) GPS संग्राहक (अंटार्टिक) का तंत्र ( Network ) है जो की F परत की महत्वपूर्ण आवृत्तियों एवं ऊंचाइयों ( foF2, hmF2) इत्यादि एवं लम्बवत कुल electron मात्रा ज्ञात करने के लिए सुविस्तृत मापन करता है। भारतीय अक्षांशों के समानान्तर आने वाले कई Stations मे 1975 से लेकर के 1993 तक के बहुत सारे आंकड़ो का खाता ( Data Bank ) प्राप्त हुआ है। इन आंकड़ो का प्रयोग क्षेत्रीय आयनमंडलीय Models को विकसित करने मे किया गया है। अन्तरिक्ष मौसम के अध्ययन के साथ साथ airglow उत्सर्जन की modeling भी एक नया कदम साबित हुआ है, thermo ionospheric coupling एवं ऊपरी वायुमंडलीय dynamics की प्रक्रिया को समझने मे।

पिछले कुछ दशको मे Ionosonde एवं GPS जैसे आयनमंडल का अनुश्रवण करने वाले उपकरणो द्वारा निम्नलिखित गतिविधियों पर प्रकाश डाला गया है।

  • सौर्य flare के दौरान ऊपरी आयनमंडल की X-ray एवं EUV Fluxes के लिए प्रतिक्रिया ।
  • भूचुंबकीय तूफानों के लिए निम्न अक्षांश आयनमंडल की प्रतिक्रिया का अध्ययन।
  • आयनमंडलीय मानको मे होने वाले दीर्घावधिक परिवर्तनों का अध्ययन।
  • दिल्ली के ऊपर F1 एवं F2 परत मे अतिरिक्त स्तर-विन्यास (stratification).

आयनमंडलीय मानको का अध्ययन एवं उनकी अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ आयनमंडलीय मॉडल से तुलना ।

सुविधाएं ।

1. भूमि आधारित तकनीकि : Pulse Sounding तकनीकि – Ionosonde प्रणाली : Pulse Sounding तकनीकि एक बहुत ही सशक्त तकनीकि है जो की पृथ्वी के निचले भाग के विभिन्न मानको के मापन के लिए काम मे आती है। संचालन की एक विशिष्ट अवस्था मे ध्वनिक pulse पुनरावृत्ति आवृत्ति जो कि 60/s होती है एवं उच्च ऊर्जा जो कि 20 kw होती है का प्रयोग करके 1-25 MHz तक swept हो जाता है। एक परम्परागत अभिलेखन प्रणाली (recording system) आयनमंडल से प्राप्त कि गयी प्रतिध्वनि का प्रयोग एक electronic time base पर प्राप्त हुई light के spot की तीव्रता बढ़ाने मे किया जाता है । Time base से दूरी radio pulse के time of flight ka प्रतिनिधित्व करती है जिसको कि यदि स्वतंत्र अन्तरिक्ष वेग से भाग दिया जाए तो एक equivalent path length प्रदान करता है जो कि आयनमंडल के परावर्तन बिन्दु से virtual height h का दो गुना होती है। आवृत्ति के बदलने के साथ ही recorder मे photographic time base के right angle पर move कर जाती है अत: spot of light आभासी ऊंचाई h एवं radio आवृत्ति के बीच एक graph का अनुरेखण करता है। range एवं आवृत्ति अंशांकन चिन्हक समान्यतः स्वतः insert / प्रवेश कर जाते हैं। यह अभिलेखन ionograms या h’( f ) curves के नाम से जाने जाते हैं। आजकल विश्व के विभिन्न भागों मे अत्यंत आधुनिक प्रकार के ionograms प्रयोग मे लाये जाते हैं। आधुनिक ionosonde एक सम्पूर्ण hardware एवं software प्रणाली है जो की real time HF management के लिए लिये उच्च resolution के आंकड़े एकत्रित करती है।

2. जी पी एस ( GPS ) एक भोगौलिक अयनमंडलीय scintillation एवं कुल इलेक्ट्रॉन अवयव जांच प्रणाली।

राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला नयी दिल्ली मे Novatel द्वारा निर्मित GSV – 400B GISTM संग्राहक लगाया गया, जो कि वास्तविक समय मे आयनमंडल के कुल इलेक्ट्रॉन अवयव एवं निम्न मध्य अक्षांश क्षेत्र के ऊपर हो रहे विघ्नों /हलचलों का वस्तविक समय मे निरीक्षण करता है। GSV – 400B GISTM संग्राहक एक द्वि आवृत्ति १२ CHANNEL जीपीएस संग्राहक है एवं मुख्यतः आयाम एवं फेज (PHASE) SCINTILLATION को मापने के लिये बनाया गया है। संग्राहक की २५ Hz की raw signal intensity noise bandwidth एवं १५ Hz की phase noise bandwidth यह सुनिश्चित करती है कि आयाम एवं phase scintillation के spectral घटक ५० हर्ट्ज के सैंपलिंग दर से मापे जा सके। सिंगल आवृत्ति( L१) कैरियर फेज़( Carrier phase) का तुलनात्मक अध्ययन एक स्थायी ovenized क्रिस्टल oscillator से किया जाता है जिससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि सारे PHASE SCINTILLATION प्रभाव अभिलेखित हो रहे है। GISTM प्रणाली डाटा का प्रयोग अब साधारणतः एवं मुख्यतः अन्तरिक्ष मौसम घटनाओं (SPACE WEATHER EVENTS) के दौरान दिल्ली एवं अंटारटिका क्षेत्र के ऊपर आयनमंडल के दिन प्रतिदिन एवं मौसमानुसार कुल इलेक्ट्रॉन अवयव के परिवर्तन एवं अभिलक्षणो के घटित होने के अध्ययन मे किया जा रहा हैं।

3. अतिसूक्ष्म आवृत्ति संग्राहक / रिसीवर

२७ Insea अभियान के दौरान समुद्र मे स्वदेशी निर्मित अति सूक्ष्म आवृत्ति संग्राहक लगाया गया। BIPM औस्ट्रेलिया द्वारा प्रेषित की जा रही १९.८ KHz की आवृत्ति को संग्रहित करने के लिये शुद्ध रूप से समायोजित लूप एंटिना ( LOOP ANTENNA ) का प्रयोग किया गया। १९.८ KHz की आवृत्ति का विशेष गुण यह है की यह लगातार प्राप्त होती रहती है जिसे कि बाद मे analog to digital converter ka प्रयोग करके अंकीय डाटा मे बदला जा सकता है। एवं system मे store हुये डाटा को labview मे विकसित हुये स्वदेशी सॉफ्टवेयर का प्रयोग करके onscreen देखा जा रहा है।

4.उपग्रह आयभार


आयनमंडल गतिकी पर आधारित अध्ययनो के लिये राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला ने ISRO को अंतरिक्षीय आधारित आयभार प्रदान कर के सहयोग दिया है। वर्तमान मे यह GROUP ISRO के SENSE PROJECT ( SATELLITE FOR EARTH’s Near Space Environment / धरती के समीपिक वातावरण के लिये उपग्रह ) के लिये कार्यरत है। यह Group वायुमंडल के वैद्युतक्षेत्र एवं चालकता के लिये balloon study/बैलून अध्ययन मे भी कार्य कर रहा है।

SROSS C2 पर RPA प्रयोग।

RPA संवेदक की अनुप्रस्थ काट

संवेदक ग्रिड्स १०० x १०० एवं ५० x ५० की संख्या मे टंगस्टन तारो पर स्वर्ण धातु की चढ़ी हुई परत के रूप मे होती हैं जिनकी पारदर्शिता ९० से ९५ प्रतिशत तक होती है।

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